सोमवार, 2 जून 2008

रुके रुके से कदम...

जब स्कूल में था, नवमीं- दसवीं में, तो दोस्तों का एक समूह हमारा भी हुआ करता था। बड़ा ही मस्त। बहुत जिंदादिल- जैसा शायद उम्र में ज्यादातर लोग हुआ करते हैं। साथ पढ़ना, साथ खेलना और साथ साथ ही मोहल्ले कि सड़कों पर घूमना। कोई चिंता नहीं। koi फिक्र नही उम्र भर के लिए जैसे रिश्ते बन गए थे। उस दौर में घरवालों कि उतनी चिंता नहीं थी जितनी दोस्तों कि थी। और ऐसा शायद मेरे साथ ही नहीं हमारे समूह के हर लोगों के साथ था। यह दौर विश्वविद्याला तक चला। हाँ, दोस्त भले ही बदलते रहे या जुड़ते रहे पर दोस्ताने का अंदाज़ वही रहा।

आज विश्वविद्याला छोडे हुए महज़ दस साल हुए हैं। हलांकि दस साल कम नही होते पर इतने ज्यादा भी नहीं होते कि किशोरावस्था के आरंभ से लेकर जवानी के शुरुआती दिनों तक के सालों की याद को धुंधला कर दें। आज भी मेरे दोस्त हैं। कुछ वह भी हैं जो स्कूल के दिनों से साथ थे पर कहीं न कहीं उस स्पंदन का अभाव है जो उस दौर में हुआ करता था।

कुछ दिन पहल एक पुराने मित्र को प्लेन में देखा। मेरे ही दो सीट आगे बैठा हुआ था। उसके साथ कई साल गुज़रे थे। पहली बार जब उसे देखा तो अन्दर से खुशी हुई। सोचा अन्दर जाकरउसके बगल wआली सीट पर बैठ खूब बातें होंगी। पर पता नही क्या हुआ, अंदर आते आते सारा जोश ठंडा हो गया। उससे हाथ तक नही मिलाई। पता नही क्यों इक्षा ही नही हुई। बाद में घर आकर बड़ा पश्चताप हुआ। और उसे मेल करके सब कुछ बता भी दिया। और उसका जब जवाब आया तो लिखा था...दोस्त, देखा तो मैंने भी तुम्हे था!

2 टिप्‍पणियां:

अनाम ने कहा…

Shayad isilye to nahin ki aap plane me the? Onchaayi par uthane ke baad kaun doston ko pehchanta hai? Pehchan bhee le to baat kaun kartaa hai? Yahan to aap aur aapka dost dono hawa me the...

अनाम ने कहा…

kahin aisa to nahi ki woh bachpan ka aapka pyaar ho...jiske pati ko dekh kar aap jhijhak gaye....